महापर्व चैती छठ इस रोज से शुरू…

Sandeep Jain - 3/24/2025 7:45:41 AM -

झारखंड, बिहार, यूपी और बंगाल समेत पूरे देश में लोक आस्था का महापर्व छठ (Chaiti Chhath 2025) साल में दो बार आता है—पहला चैत्र मास में और दूसरा कार्तिक मास में। छठ पूजा की सबसे खास बात यह है कि इसमें न सिर्फ व्रति बल्कि पूरा परिवार और समाज मिलकर आस्था की डोर में बंध जाते हैं। इस बार चैती छठ महापर्व 1 अप्रैल को नहाय-खाय से शुरू होगा। इस दिन व्रति गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन में कद्दू-भात और चने की दाल विशेष रूप से बनाई जाती है। 2 अप्रैल को खरना है। इस दिन व्रति पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ और चावल से बनी खीर व रोटी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह प्रसाद ही व्रतियों का अंतिम भोजन होता है, इसके बाद वे 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं। 3 अप्रैल को संध्या अर्ध्य है। इस दिन व्रति नदी, तालाब या घर के आंगन में बनाये गये छठ घाट पर पहुंचकर डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। छठ गीतों की गूंज से पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है—
“केलवा के पात पर उगेल हे सूरज देव, भिनुसरवा हेराइल अर्घ्य के बेर…”

चौथा दिन यानी 4 अप्रैल को उषा अर्घ्य है। इस रोज उगते सूर्य को अर्घ्य देने का होता है। जैसे ही सूर्य की पहली किरण जल से टकराती है, व्रति अर्घ्य अर्पण कर व्रत का समापन करते हैं। इसके बाद प्रसाद ग्रहण कर चार दिनों की कठिन साधना पूरी होती है। छठ के दिनों में झारखंड और बिहार के गंगा घाट, कोसी नदी, तालाबों और छोटे जलाशयों पर जबरदस्त चहल-पहल देखने को मिलती है। घाटों की सफाई की जाती है, भव्य सजावट होती है और सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये जाते हैं। घरों में ठेकुआ, कसार, फल-फूल और गन्ना का खास इंतजाम किया जाता है। महिलाएं पारंपरिक परिधान (पीली या लाल साड़ी) पहनकर सूर्यदेव को अर्घ्य देती हैं, और पुरुष व्रति धोती-कुर्ता धारण करते हैं।

छठ पर्व का महत्व (Chaiti Chhath 2025)
छठ सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा का प्रतीक है। यह पर्व सूर्य उपासना का सबसे कठिन तप माना जाता है, जिससे स्वास्थ्य लाभ, मनोकामनाओं की पूर्ति और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। छठ की एक खास बात यह भी है कि यह किसी जाति-धर्म की सीमाओं में बंधा पर्व नहीं है, बल्कि इसमें हर समाज और हर वर्ग के लोग एक साथ जुड़ते हैं। छठी मईयां की जयकारों के बीच जब सारा माहौल भक्तिमय होता है, तब ऐसा लगता है मानो पूरी सृष्टि ही इस लोक आस्था के पर्व में शामिल हो गई हो।

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