बच्चे से बुजुर्ग तक सभी रात में जाते थे 'स्कूल', गजब थी शिबू सोरेन की वह पहल.

Sandeep Jain - 8/6/2025 7:50:20 AM -

दिशोम गुरु शिबू सोरेन नहीं रहे, लेकिन उनके किस्से झारखंड के गांवों और विशेषकर आदिवासी समाज के बीच लोगों की जुबान पर हमेशा बने रहेंगे। लंबी बीमारी के बाद 81 वर्ष की उम्र में दिल्ली में अंतिम सांस लेने वाले शिबू सोरेन की कर्मभूमि झारखंड के गांव और खेत खलिहानों में रही है। आदिवासियों को सशक्त करने के लिए उन्होंने नशे की लत जैसी कई तरह की कुरीतियों को दूर करने के लिए संघर्ष किया तो शिक्षा की तरफ मोड़ने की भी भरसक कोशिश की।

1970 के दशक में आदिवासियों को अधिकार दिलाने की लड़ाई शुरू करने वाले शिबू सोरेन ने धनबाद के टुंडी में रात्रि पाठशाला शुरू कराई थी। इसमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक पढ़ाई करने पहुंचते थे। टुंडी के आंदोलन में शिबू सोरेन के सहयोगी रहे लाला सुराल बताते हैं कि जिस गांव में दिशोम गुरु शिबू सोरेन रात्रि पाठशाला खोलते थे, उस गांव के सबसे पढ़े-लिखे युवक को उसमें पढ़ाने की जिम्मेवारी मिलती थी। यह रात्रि पाठशाला धनबाद से सटे गिरिडीह, जामताड़ा और दुमका में भी शुरू हो गई।

शिबू सोरेन का मानना था कि दिनभर काम करने वाले मजदूरों को पढ़ाने के लिए रात्रि पाठशाला ही बेहतर विकल्प है। शिबू ने गांवों में रात्रि पाठशाला खोल निरक्षर आदिवासियों को पढ़ना सिखाया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से शिबू ने समाज को जगाने का काम किया था। शिबू सोरेन ने आंदोलन के साथ विकास की जमीन तैयार कर राजनीति को नया आयाम दिया। शिबू के मंत्रिमंडल में शामिल शिक्षा मंत्री राजेंद्र तिवारी को रात्रि पाठशाला की देखरेख का जिम्मा था।

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